जग- हँसाई

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अइसे त उहो

भोजपुरिए खाति मरत ह

एक बेर कुछो कह के त देखs

केहू कुछहू नाही करत ह

जइसे एगो फिलिम कइके

सुपर स्टार

वइसहीं दू पन्ना लिख के

बड़का लिखनिहार

एगो पतिरका निकार के

लमहर संपादक ॥

 

एगो परम्परा चलत बा

चरचा मे आवे खाति

भोजपुरी विरोध के

हिन्दी हितचिंतक

कहाए के पहिलका सीढ़ी

आपन हित साधे कs

पहिलका जोगाड़

केहू खाति

आपन खुन्नस निकारे कs मोका ॥

 

जात पाँत के भुलाइल बा

हम कि तू

सभके भीतरी खउलत देखाला

विष के गगरी

मोका हेरत हेरत

केहू कतहूँ उलटी कs देला

फेरु ओकरा पोछे के उधातम

बढ़त बा राउर महातम ॥

 

अपने भीतरी झाकीं

कूल्हि बुझाये लागी

नीमन – बाउर, हित – मीत

एक्के आँखी देखल

जवन फुटलो आँखी ना सोहला

ओहू के कारन

ललक पलले खुदही कहाए खाति

तारनहार

एकरो बना दिहलीं ब्योपार   ॥

 

एक गो राहिला

ओहू खाति भरसांय

का भुलाई , का तिराई

का लेके घरे जाई

भूखला के माई

जग- हँसाई ॥

 

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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