पूस के रात

guru

थर-थर कापत हाड़,पूस के रतिया !

जीव-जन्तु बेहाल, छपलस विपत्तिया !!

 

कोंदो के पुअरा प, लेवा बिछवना

बोरसि में करसि, चिपरी जरवना

किंकुर-किंकुर क,सभ काटत रतिया !!

 

लइका-जवान बुढ,घर में पटाइल

चिरइ-चुरुंगसभ, खोतवां लुकाइल !!

ठाढवा हेरवले ह,सभकर मतिया !!

 

छुपले सुरुज जाइ,कवना नगरिया !

परत कुहेसा घोर,दिनवों अन्हरिया !!

अइसन भइल ”गुरू” पूस के रतिया !!

 

  • गुरुबिंद्रा सिंह “गुरु”

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