भोजपुरी कि संवैधानिक मान्यता के लिए अब तक किये गए सामाजिक प्रयास

santosh patel

भोजपुरी आन्दोलन भोजपुरी जनपदीय योजना का ही एक अंग है जिसका प्रवर्तक – पंडित बनारसी दास जी चतुर्वेदी हैं I उन्हीं के प्रयास से सन 1930 ई. में “ब्रज साहित्य मंडल” की स्थपाना आगरा में हई थी और उन्हीं की प्रेरणा से सन 1946 ई में भोजपुरी आन्दोलन का सूत्रपात हुआ, जिसका माध्यम बलिया के भोजपुरी साहित्यकार कुलदीप नारायण झड़प को बनाया गया था I फलस्वरूप “अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य –सम्मलेन” का पहिला अधिवेशन दिन्नाक 2-3 मार्च 1947 ई को सिवान में सफलतापुर्वक सम्पन्न हुआ क्योंकि उक्त अधिवेशन में प्राय: समस्त भोजपुरी क्षेत्र के प्रतिनिधिगण पधारें एवं सन्देश-सहयोग कियाI उस अधिवेशन की अध्यक्षता आचार्य बलदेव उपाध्याय ने की I इसी क्रम में दुसरे और तीसरे सम्मलेन क्रमशः महापंडित राहुल सांकृत्यायन तथा तथा डॉ उदय नारायण तिवारी की अध्यक्षता में गोपालगंज और बलिया में हुए I

 भोजपुरी आन्दोलन के प्रारम्भिक कार्यकर्ताओं में पंडित महेंद्र शास्त्री का स्थान सर्वोपरि है I शास्त्री जी भोजपुरी आन्दोलन को अपना प्रधान लक्ष्य हिन् बना लिया था तथा मरते दम तक भोजपुरी के सेवा करते रहे I वे भोजपुरी की ही नींद सोते थे और भोजपुरी के लिए जागते थे I उनकी लगन के फलस्वरूप सारं जिला में भोजपुरी अन्न्दोअल्न का व्यापक प्रचार प्रसार हुआ I ज्ञातव्य है कि आचार्य महेंद्र शास्त्री ने 1947-48 में भोजपुरी भाषा की पहली पत्रिका “भोजपुरी” का संपादन और प्रकाशन किया I

 पहला भोजपुरी संसद बनारस के जगतगंज में 1960-62 में डाक्टर स्वामिनाथ एवं राहगीर जी के नेतृत्व में भोजपुरी प्रदेश के लिए शुरु हुआ उसमें बलिया के जगदीश ओझा सुन्दर ,डाक्टर रामविचार पण्डे, भिखारी ठाकुर, विश्वनाथ शैदा जी, विप्रजी, बेकार भोजपुरी और जनार्दन पाण्डेय जैसे महान हस्ती जुटे और  टाउन हॉल के मैदान में बहुत बड़ा सम्मलेन 1965 में हुआ I जिसमे बिहार के मुख्यमंत्री केदार पांडे जी स्वागताध्यक्ष थे I भोजपुरी संसद द्वारा जारी किये गए भोजपुरी प्रदेश का नक्सा देखा जाय तो उसमें जौनपुर से मोतीहारी तक प्रदेश के मांग हुआ 5-6 साल तक काफी गहमा गहमी भी रहा I इसी संस्था के माध्यम से भोजपुरी कहानिया मासिक पत्रिका भी निकली और भोजपुरी उपन्यास भी प्रकाशित हुए I

 इसी कड़ी में अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मलेन की स्थापना 7 नवम्बर, 1973 में बिहार के पाटलिपुत्र के पावन धरती पर केदार पाण्डेय जी के छाज्जुबाग स्थित निवास पर उनकी अध्यक्षता में हुयी 1976 ई.  में भोजपुरी भाषा, साहित्य आ संस्कृति के विकास के लिए केदार पाण्डेय जी की अध्यक्षता में बिहार में भोजपुरी अकादमी स्थापना का निर्णय लिया गया I भोजपुरी भाषा को सरकारी संरक्षण के लिए 1978 ई. में बिहार सरकार ने मान्यता प्रदान की I

1976 ई. ही भोजपुरी भाषा, साहित्य आ संस्कृति के विकास के लिए केदार पाण्डेय जी की अध्यक्षता में बिहार में भोजपुरी अकादमी स्थापना का निर्णय लिया गया I भोजपुरी भाषा को सरकारी संरक्षण के लिए 1978 ई. में बिहार सरकार ने मान्यता प्रदान की I

रही बात अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मलेन की तो इसका पहला अधिवेशन प्रयाग, इलाहबाद में 8-9 मार्च, 1975 ई में डॉ उदय नारायण तिवारी जी के अध्यक्षता में हुयी I इस संस्था ने लगातार भोजपुरी साहित्य के विकास, सांगठनिक सवाल, भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता और अस्मिता रक्षा के आन्दोलन में अपनी महती भूमिका अपनाई है I ध्यान देने योग्य बात यह है कि 28-29, दिसंबर, 2013 को इसका पच्चीसवां अधिवेशन पटना में संपन्न हुआ जिसकी अध्यक्षता डॉ रिपुसूदन प्रसाद श्रीवास्तव जी की I जबकि अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मलेन ने उत्तर प्रदेश, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ और बिहार के भिन्न भिन्न स्थानों पर 24 अधिवेशन आयोजित किये I इस संस्था ने संविधान के अष्टम अनुसूची और साहित्य अकादमी में भोजपुरी भाषा की मान्यता, साहित्य अकादमी में मान्यता, भोजपुरी पाठ्य पुस्तक के आंशिक प्रकाशन को पूरा करने की आवश्यता, अध्यापन के लिए पद सृजन, भोजपुरी डिग्रीधरी युवक-युवतियों के लिए रोजगार सृजन की व्यवस्था हेतु सरकार को जागृत करना I

 भोजपुरी की मान्यता के लिए प्रयास विगत 1970 से निरंतर हो रहा है लेकिन 21-22 मार्च, 1992 में अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मलेन के 12 वें अधिवेशन जिसकी अध्यक्षता मोती बीए कर रहे थे वहां भी इस मुद्दे को मुखर रूप से उठाया गया जबकि छपरा में उसी वर्ष पशुपति सिंह के संयोजन में भोजपुरी वाहिनी का गठन हुआ और 22 मार्च 1992 को छपरा में एक जुलुस (प्रदर्शन) किया गया, महत्वपूर्ण बात यह कि पशुपति सिंह ने भोजपुरी कलम नमक एक पत्रिका निकाल पर भोजपुरी क्षेत्र के संसद और विधायक से संपर्क किया I भोजपुरी आन्दोलन के इस  ताजे  दौर में 18 अक्तूबर 1994 में मुबारकपुर अधिवेशन में भोजपुरी अभियान समिति बनी और  डॉ प्रभुनाथ सिंह के अगुवाई में 27 फ़रवरी, 1996  को राष्ट्रपति जी को इस बाबत ज्ञापन दिया गया  भोजपुरी को आंठ्वी अनुसूची में समावेश और साहित्य अकादमी से मान्यता के मामले में सार्थक पहल करने का वचन भी राष्ट्रपति जी ने दिया I

इस दिशा में सरकार द्वारा किसी भी प्रकार का सार्थक पहल जब दिखाई नहीं दिया तो सन 2000 में दिल्ली में विश्व भोजपूरी सम्मलेन बनाया गया और उसके  कार्यकारी अध्यक्ष महाराजगंज (बिहार) के तत्कालीन सांसद श्री प्रभुनाथ सिंह ने लोक सभा में गैर सरकारी विधेयक पेश कर के यह मांग जोरदार ढंग से उठाया तभी संसद के यह सवाल बार बार उठाया गया वहीँ 2003 में मैथिली के मान्यता मिल गयी ले भोजपुरी को ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया  I मांग उठती रही, सरकार आश्वासन पर आश्वासन देती रही जो अब भी जारी है I

29 जनवरी 2004 के दिल्ली में भोजपुरी समाज आ पूर्वाचंल एकता मंच के संयुक्त तत्वाधान में जंतर -मंतर पर जोरदार प्रदर्शन हुआ जिसमे डॉ प्रभुनाथ सिंह, दिल्ली के कांग्रेसी विधायक श्री महाबल मिश्रा, भोजपुरी समाज के अध्यक्ष श्री अजित दुबे और पूर्वांचल एकता मंच के अध्यक्ष श्री शिवजी सिंह ने प्रधानमंत्री को एक ज्ञापन सौंपा I

भोजपुरी राज्य का हुंकार सासाराम ( रोहतास, बिहार) में 4-5 नवम्बर 2006 को अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मलेन जे 21 वें अधिवेशन में हुआ  I इसी अधिवेशन में प्रो केदारनाथ सिंह और प्रो प्रभुनाथ सिंह ने भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता सम्वन्धी तीन प्रस्ताव रखा जो इस तिन प्रस्तावों में पहला था उसे बहुत बहस के बाद पास कर दिया गया  I

अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मलेन के और भी अधिवेशन निम्नलिखित है जिसमे भोजपुरी को अष्टम अनुसूची सम्वन्धी प्रस्ताव अनुमोदित किये गए और सरकार के पास भेजा गया –

अखिल भारतीय भोजपुरी साहित्य सम्मेलन

अधिवेशन स्थल तिथि अध्यक्षता

पहला प्रयाग, इलाहाबाद 8-9 मार्च, 1975 डाॅ॰ उदय नारायण तिवारी

दोसरका संत कबीर नगर, पटना 15-16 मई, 1976 आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

तिसरका महेन्द्र शास्त्री, सीवान 29-30 अक्टूबर 1977 डाॅ॰ भगवत शरण उपाध्याय

चउथा बाबाराघव दास नगर, देवरिया (उ.प्र)14-16 दिसम्बर 78 डाॅ॰ भगवत शरण उपाध्याय

पाँचवाँ सिपाही सिंह श्रीमंत नगर, मोतिहारी 14-16 मार्च 1980आचार्य देवेन्द्रनाथ शर्मा

छठा परमेश्वर शाहीबादी नगर, जमशेदपुर 6-7 जून 1981 डाॅ॰ राम विचार पाण्डेय

सातवाँ लक्ष्मी सखी नगर, अमनौर(सारण) 29-31 अक्टूबर 1982 ईश्वरचन्द्र सिन्हा

आठवाँ बिलासपुर (म. प्र.) 30-31 अक्टूबर 1983 डाॅ॰ विवेकी राय

नउवाँ राँची (बिहार) 26-27 अक्टूबर 1985 गणेश चैबे

दसवाँ बोकारो (बिहार) 8-9 अक्टूबर 1989 आचार्य विश्वनाथ सिंह

ग्यारवाँ रेणुकुट (उत्तर प्रदेश) 26-27 मार्च 1992 डाॅ॰ विद्यानिवास मिश्र

बारहवाँ छपरा (बिहार) 21-22 मार्च, 1992 मोती बी॰ ए॰

तेरहवाँ आरा (बिहार) 3-4 अप्रैल 1993 दंडिस्वामी विमलानंद सरस्वती

चउदहवाँ भागत प्रसाद वर्मा नगर 18-19 अक्टूबर 1994 भोलानाथ गहगरी

मुबारकपुर, सारण (बिहार)

पन्द्रहवाँ गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) 6-7 अप्रैल 1996 पांडेय कपिल

सोरहवाँ एकमा, सारण (बिहार) 8-9 अप्रैल 1998 विजय बलियाटिक

सत्रहवाँ अशोकनगर, जलालपुर सारण 4-5 अप्रैल 2000 अर्जुन दास केशरी

अठारहवाँ संत धरनी दास नगर मँझी 7-8 फरवरी 2003 डाॅ॰ प्रभुनाथ सिंह

उन्नीसवाँ लक्ष्मीसखी नगर, मूंजा 15-16 जनवरी 2004 अनिल कुमार आंजनेय

गोपालगंज

बीसवाँ बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन 4-5 मार्च 2006 नागेन्द्र प्रसाद सिंह

इकइसवाँ रामेश्वर सिंह काश्यप् नगर 4-5 नवम्बर 2006 डाॅ॰ केदारनाथ सिंह

बाइसवाँ रायपुर (छत्तीसगढ़) 28-29 मार्च 2009 गिरिजाशंकर राय गिरिजेश

तेइसवाँ शहीद विनोद चैबे नगर 23-24 जनवरी 2010 प्रो॰ ब्रजकिशोर

चैबीसवाँ तुलसी भवन, जमशेदपुर 26-27 नवम्बर 2011 सूर्यदेव पाठक पराग

पच्चीसवाँ पशुपतिनाथ नगर, पटना 28-29 दिसम्बर 2013 डाॅ॰ रिपुसूदन प्रसाद श्रीवास्तव

इसी प्रकार हम पूर्वांचल एकता मंच द्वारा भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता हेतु किये गए प्रयासों पर एक दृष्टि डाल लेते हैं –

पूर्वांचल स्वाभिमान समारोह -8 अप्रैल 2001

विश्व भोजपुरी सम्मलेन – 2002

पूर्वांचल स्वाभिमान समारोह -2003

भोजपुरी धरना प्रदर्शन – 30 जनवरी, 2004 जंतर मंतर पर

भोजपुरी स्वाभिमान समारोह – 2004

पूर्वांचल स्वाभिमान समरोह -2005

पूर्वांचल स्वाभिमान समरोह -2006

विश्व भोजपुरी सम्मलेन – 2008- 8-9 अप्रैल (पूर्वांचल एकता मंच और भोजपुरी समाज के संयुक्त तत्वाधान में)

विश्व भोजपुरी सम्मलेन – 2010 – 9-10 जनवरी

विश्व भोजपुरी सम्मलेन – 2011 -9-10 अप्रैल

जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन – 2011- 4 अगस्त

विश्व भोजपुरी सम्मलेन – 2011 -9-10 अप्रैल 9-10 अप्रैल

जंतर मंतर पर धरना प्रदर्शन – 2012- 28 अगस्त

विश्व भोजपुरी सम्मेलन भोजपुरी भाषा, कला, संस्कृति, जीवन शैली के प्रचार-प्रसार, संरक्षण, सम्बर्धन, परिरक्षण के लिए समर्पित एक विश्व स्तरीय संगठन है। विश्वभर में अपने श्रम, प्रतिभा, कल्पनाशक्ति और समर्पण के काण अपना विशेष स्थान बनाने वाले पन्द्रह करोड़ भाजपुरियों की एकता, आपसी संवाद, पहचान और अपनी से सन् 1995 में इस संस्था की स्थापना हुई थी।
मात्र दस वर्ष की अल्पावधि में सम्मेलन ने भोजपुरिया कला और संस्कृति के क्षेत्र में तो कीर्तिमान स्थापित किया ही है, लाखों को एक मंच पर जुटाकर उनकी अस्मिता का बोध भी कराया है।
अधिवेशन –
हर चार वर्ष पर विश्व सम्मेलन और प्रतिवर्ष राष्ट्रीय अधिवेशन का आयोजन सम्मेलन द्वारा आयोजित होता है, जिसका विवरण इस प्रकार है –
विश्व सम्मेलन 1995 देवरिया (भारत)
2000 मोका (माॅरीशस)
2003 कोलकत्ता (भारत)
2009 पोर्टलुई (माॅरीशस)
राष्ट्रीय अधिवेशन 1996 पटना
1997 नई दिल्ली
1998 भोपाल
2000 मुम्बई
2001 भिलाई
2004 नागपुर
2006 ठाणे (महाराष्ट्र)
2007 बाराणसी (उत्तर प्रदेश)
2010 आगरा (उत्तर प्रदेश)
विश्व एवम् राष्ट्रीय अधिवेशनों में लगभग पांच लाख लोग अतिथि, कलाकार, प्रतिभागी और दर्शक स्रोता के रूप में उपस्थित रहे।
अतिथि –
इन अधिवेशनों में मुख्य अतिथि, सभाध्यक्ष एवं विशिष्ट अतिथि के रूप् में निम्नलिखित लोगों का आगमन हुआ –
डाॅ॰ शंकर दयाल शर्मा (राष्ट्रपति, भारत सरकार)
डाॅ॰ कासिम उत्तीम (राष्ट्रपति माॅरीशस)
श्री पाल वरांजे (पूर्व प्रधानमंत्री माॅरीशस)
डाॅ॰ ए॰ आर॰ किदवई (राज्यपाल, बिहार)
श्री रोमेश भण्डारी (राज्यपाल, उत्तर प्रदेश)
श्री प्रभा शंकर सिंह (मुख्य न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय, भारत सरकार)
श्री के॰ एन॰ सिंह (राज्यपाल, उत्तर प्रदेश)
श्री बलिराम भगत (राज्यपाल, राजस्थान)
श्री महावीर प्रसाद (राज्यपाल, हरियाणा)
श्री मु॰ शफी कुरैशी (राज्यपाल, मध्य प्रदेश)
श्री मारकण्डेय सिंह (उप-राज्यपाल, दिल्ली)
श्री दिनेशनन्दन सहाय (राज्यपाल, छत्तीसगढ़)
श्री चन्द्रेशेखर (पूर्व प्रधानमंत्री)
श्री अजीत जोगी (पूर्व मुख्यमंत्री, छत्तीसगढ़)
श्री वी॰ पी॰ सिंह (पूर्व प्रधानमंत्री)
श्री सोरेन जे॰ शाह (राज्यपाल, पं॰ बंगाल)
अन्य विशिष्ट अतिथि: सर्व श्री शत्रुघ्न सिन्हा, नौशाद, ए॰ के॰ हंगल, संगीतकार श्रवण, सुजीत कुमार, राकेश पाण्डेय, बिरजू महाराज, डाॅ॰ कपिला वात्स्यायन, डाॅ॰ विद्यानिवास मिश्र, डाॅ॰ केदारनाथ सिंह, डाॅ॰ मैनेजन पाण्डेय, अनूप घोषाल आदि।
महत्वपूर्ण कार्य: सम्मेलन ने कला, साहित्य एवं संस्कृति के क्षेत्र में स्थायी महत्व के निम्नलिखित कार्य किये हैं –
भोजपुरी हिन्दी शब्दकोशों का प्रकाशन
विश्वस्तरीय त्रैमासिक पत्रिका ‘समकालीन भोजपुरी साहित्य’ का प्रकाशन (अब तक छब्बीस अंक प्रकाशित)
ग्रामदेवता (उपन्यास) का प्रकाशन
भोजपुरी के अमर लोकगीत कैसेट श्रृंखला जारी (चार खण्ड / जीवन चक्र, ऋतुचक्र, भक्तिचक्र)
इनके अतिरिक्त निम्नलिखित परियोजनाएं प्रक्रिया में है –
भोजपुरी लोककथा कोष (तीन खण्ड)
भोजपुरी व्याकरण
भोजपुरी साहित्य का  इतिहास
इण्टरनेट का भोजपुरी का वेबसाईट
भोजपुरी सड़क से संसद तक
भोजपुरी भाषा को  संविधान की  आठवीं अनुसूची में शामिल कराने  का  सवाल  संसद के अन्दर सबसे पहले  बिहार प्रान्त के महाराजगंज संसदीय क्षेत्र के सांसद श्री प्रभुनाथ सिंह ने उठाया ।  प्रभुनाथ सिंह ने जब  वर्ष 1998 में पहली  बार सांसद बने तब  से भोजपुरी भाषा के सवाल के लेके काफी गंभीर रहे । सांसद प्रभुनाथ सिंह जी सबसे पहिले “30 नवम्बर 1999 में गैर-सरकारी संकल्प“ सदन में ले के आए जिसमे यह  मांग किया  कि भोजपुरी भाषा को  संविधान की  आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाय ।  1998 से वर्ष 2004 तक केन्द्र में एन॰ डी॰ ए॰ की  सरकार रही और  प्रभुनाथ सिंह को यह पूरा भरोसा था  कि सरकार उनकी हैं तो  मांग जरूर मंजूर होगी पर ऐसा न हो सका ।
फिर वर्ष 2000 में प्रभुनाथ सिंह ने  भोजपुरी भाषा को  आठवीं अनुसूची में शामिल करने हेतु  ”संविधान संशोधन विधेयक“ पेश किया पर इसे  सरकार ने  मंजूर नहीं की  । सरकार के रूख को  भांपते उन्होंने आन्दोलन को तेज किया  और  विश्व के  कोना-कोना में आपन आवाज बुलंद करने  के उद्देश्य से 26-27 नवम्बर 2000 को  दिल्ली के मावलंकर हाॅल में ‘विश्व भोजपुरी सम्मेलन’ का आयोजन कराया । इस सम्मेलन में देश-और -विदेश के कोना-कोना से भोजपुरी भाषी विद्वान, साहित्यकार, कलाकार लोगों का  दिल्ली में जमवाड़ा हुआ । विदेशो से लगभग 8 देशों के प्रतिनिधि इस  सम्मेलन में भाग लिया । ”विश्व भोजपुरी सम्मेलन“ कराने  के प्रेरणास्रोत रहे  महान विचारक, विद्वान और  राजनेता प्रो.(डाॅ॰) प्रभुनाथ सिंह। डाॅ॰ प्रभुनाथ सिह जी ”विश्व भोजपुरी सम्मेलन“ के माध्यम से भोजपुरी से भोजपुरी भाषा के लड़ाई का ऐसा  खाका खिंचा  कि यह  लड़ाई आग की तरह  देश-विदेश के कोना-कोना में फैला । हर शहर में भोजपुरी की  संस्था भोजपुरी सम्मेलन कराने लगी । इस ह सम्मेलन में  सबसे ज्यादा सहयोग मिला उसमे  बिहार विश्व विद्यालय के भोजपुरी विभाग के अध्यक्ष और  भोजपुरी आन्दोलन के जुझारू कार्यकत्र्ता डाॅ॰ जयकान्त सिंह ‘जय’, डाॅ॰ नागेन्द्र प्रसाद सिंह, प्रो॰ ब्रजकिशोर, जौहर शाफियाबादी, पाण्डेय कपिल, डाॅ॰ लारी आजाद, डाॅ॰ ब्रजभूषण मिश्र, मैनावती देवी मैना, कुबेर नााि मिश्र विचित्र, कृष्णानन्द ‘कृष्ण’, डाॅ॰ जीतेन्द्र वर्मा आदि भोजपुरी सपूतन के नाम प्रमुखता से लिया जा सकता हैं। 26-27 नवम्बर 2000 को मावलंकर हाॅल इस  सम्मेलन का  उद्घाटन पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर जी ने किया और अध्यक्षता डाॅ॰ केदारनाथ सिंह जी।
 19 दिसम्बर 2002 के संसद के शीतकालीन सत्र में सांसद प्रभुनाथ सिंह जी सदन में ‘ध्यानाकर्षण प्रस्ताव’ ले कर आये जिस पर  सदन के अन्दर घंटो बहस चला । इस  बहस में भाग लेवे वाले  सांसद लोग में सर्वश्री रघुनाथ झा (गोपालगंज), कुँवर अखिलेश सिंह (महाराजगंज, उत्तर प्रदेश), बासुदेव आचार्य (बांकुरा), रामविलास पासवान (हाजीपुर), श्री सालखन मुर्मू (मयूरगंज), श्री सुदीप बंधोपाध्याय (कलकत्ता, उत्तर-पश्चिम), प्रियरंजन दास मुंशी (रायगंज), विजयेन्द्र पाल सिंह बदनोर (भीलवाड़ा), सरदार सिमरजीत सिंह मान (संगरूर), चंद्रशेखर (बलिया)।इस  चर्चा में भोजपुरी भाषी आ गैर भोजपुरी भाषी सांसद लोग भाग लिया । सब लोग भोजपुरी भाषा के संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल करने की वकालत किये । सिमरजीत सिंह मान जो  पंजाबी थे उन्होंने खा  ‘हमारे दसवें गुरु गुरुगोविन्द सिंह जी ने अपनी रचनाएँ भोजपुरी में लिखीं थीं। हम इस प्रस्ताव को स्वीकृत करना चाहेंगे। सरकार से यह अनुरोध भी है कि पटियाला के पंजाबी विश्वविद्यालय में भोजपुरी पीठ की स्वीकृति दी जाए ताकि हम यह भाषा समझ सके हमारे ग्रंथों के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है।’
वहीं भोजपुरी क्षेत्र के सबसे बड़े नेता और  पूर्व प्रधानमंत्री चन्द्रशेखर ने कहा  कि, ‘मुझे आश्चर्य है कि सरकार, इस देश को कहाँ तक ले जाएगी। बात यहाँ तक आ पहुँची है कि 35-36 भाषाओं को सविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर दिया जाए। हिन्दी तो एक वैकल्पिक भाषा बनी नहीं और हम 35 भाषाओं को और जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। जगह-जगह से सवाल आ रहा है कि हमारी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए। आदिवासियो की अलग भाषा है।मैं भी भोजपुरी बोलता हूँ और यहाँ जो भोजपुरी बोलने वाले हैं उन सबसे अच्छी भोजपुरी बोलता हूँ, लेकिन मैं ऐसा मानता हूँ कि इस तरह की मांगों को संसद में उठाना और सरकार का इस तरह से आश्वासन देना ठीक नहीं है। मैं मंत्री महोदयजी से प्रार्थना करता हूँ कि बड़ी कृपा होगी अगर मंत्री महोदय आश्वासन देने के बजाय हिन्दी को विकसित करने का काम करे और जो लोग इन भाषाओं और बोलियों को विकसित करना चाहते हैं, वे इनका विकास करें। प्रभुनाथ सिंह जी बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, वे भोजपुरी को विकसित करने का काम करते रहे लेकिन उसे संविधान के आठवीं अनुसूची में लाने की कोशिश न करें।’
सरकार अपने  आश्वासन के अनुकूल गठन कर दी लेकिन  आश्चर्य तब हुआ  जब कमिटी द्वारा चार भाषा के शामिल करने की  सिफारिश की गयी पर उसमे भोजपुरी शामिल ना थी । मैथली समेत चार भाषाओं को  संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया गया पर  भोजपुरी सरकारी उपेक्षा की  शिकार हुयी । सरकार के  इस  रवैया से सांसद प्रभुनाथ सिंह को  बहुत  निराशा और आश्चर्य हुआ । प्रभुनाथ सिंह  तत्कालीन गृहमंत्री श्री एल॰ के॰ आडवाणी से मिल के और पत्र के  माध्यम से आपन आपत्ति जताई।
पुनः यू.पी.ए. सरकार अस्तित्व में आई । प्रभुनाथ सिंह अभी थके नहीं थे । फिर नया सिरा से अपनी  मांग को  गति प्रदान करे के उद्देश्य से संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान ‘ध्यानाकर्षण प्रस्ताव’ ले आये जिस पर चर्चा में प्रभुनाथ सिंह के अलावा श्री रघुनाथ झा (बेतिया) सुशील कुमार मोदी (भागलपुर) भाग लिए। इस  चर्चा में  सबसे खात बात यह थी  कि चन्द्रशेखर जी की तरह कोई  सांसद अबकी बार विरोध नहीं किया और  तत्कालीन स्पीकर माननीय श्री सोमनाथ चटर्जी से प्रभुनाथ सिंह जी का भरपूर सहयोग मिला । माननीय सांसद श्री रघुनाथ झा जी कहलन कि ”100 करोड़ की आबादी वाले देश में 25 करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा भोजपुरी को अष्टम अनुसूची में शामिल नहीं करके सरकार भोजपुरी भाषा भाषियों के सम्मान की अपेक्षा कर रही है, इसका मुझे बेहद दुःख है। सरकार जल्द से जल्दभोजपुरी भाषा को संविधान को अष्टम अनुसूची में शामिल करने की द्योषणा करे।“ तब तत्कालीन गृहमंत्री श्री शिवराज पाटिल जी सरकार का तरफ से उत्तर देबे खातिर खड़ा भइनी आ स्पष्ट शब्दन में कहनी कि ‘सरकार बत्रा कमिटी की सिफारिशों से सहमत है और भोजपुरी भाषा उन सभी मापदण्डों को पूरा करती है जो किसी भाषा को संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल करने के लिए रखा गया है। इसलिए जल्द ही भोजपुरी भाषा को संविधान की अष्टम अनुसूच में शामिल किया जायेगा।’ गृहमंत्री के आश्वासन के बाद माननीय सांसद प्रभुनाथ सिंह ने पूछ  कि गृहमंत्री जी यह बताने की कृपा करे कि ‘कब तक शामिल कर लिया जायेगा।’ गृहमंत्री जी कहलन ‘समय सीमा बताना ठीक नहीं है फिर भी हम शीघ्र निर्णय लेंगे।’
पुनः वर्ष 2005 के बजट सत्र के दौरान माननीय सांसद श्री रघुनाथ झा जी ने शून्यकाल के दौरान भोजपुरी भाषा को  संविधान की  आठवीं अनुसूची में शामिल करे कि सवाल उठवलन।  सांसद प्रभुनाथ सिंह गृहमंत्री और सोनिया गाँधी से सदन में मिल के मांग स्वीकार करने का  अनुरोध किया ।
फिर अप्रैल 2006 में संसद में  ग्रीष्म कालीनसत्र के दौरान-सांसद प्रभुनाथ सिंह जी ‘शून्यकाल’ के दौरान बड़ा जोरदार ढंग से भोजपुरी के सवाल सदन में उठाया । पुनः संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान 11 दिसम्बर 2006 के सांसद श्री प्रभुनाथ सिंह जी सदन में ‘ध्यानाकर्षण प्रस्ताव’ ले कर आये पर  संयोगवंश उस  दिन सदन की  कार्यवाही नहीं हुयी । लेकिन सरकार के स्टेटमेन्ट सदन पटल पर आ गइ जिसमे जवना में स्पष्ट लिखा था कि ‘संविधान की आठवीं अनुसूची में भोजपुरी और राजस्थानी भाषाओं को शामिल करने पर विचार करने के लिए करवाई शुरू कर दी गई है।’ पुनः तत्कालीन गृह राज्यमंत्री श्री प्रकाश जायसवाल के सदन में और मीडिया के सामने यह  बयान आया  कि भोजपुरी और राजस्थानी भाषा को  संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल करने  खातिर सरकार सहमत हो गई है और   कैबिनेट के स्वीकृति हेतु  प्रस्ताव भेजा जा चूका है ।
गृह राज्यमंत्री जी के आश्वासन के बाद भी सांसद श्री प्रभुनाथ सिंह जी लोकसभा अध्यक्ष से मिलके इस  चर्चा को सदन का अन्दर उठाने का  अनुरोध किया । प्रभुनाथ सिंह जी के अनुरोध को  स्वीकार करते  लोक सभा अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी जी 18 दिसम्बर 2006 के पुनः प्रभुनाथ सिंह जी के ‘ध्यानाकर्षण प्रस्ताव’ पर चर्चा करने की  अनुमति प्रदान किये । 18 दिसम्बर 2006 के ‘ध्यानाकर्षण प्रस्ताव’ पर चर्चा में भाग लेने वालों में सांसद लोग में श्री शैलेन्द्र कुमार मेहता (समस्तीपुर), प्रो. रासा सिंह रावत (अजमेर), श्री सीताराम सिंह (शिवहर), श्री गिरधारी लाल भार्गव (जयपुर), श्री देवेन्द्र प्रसाद यादव (झंझारपुर), श्री बृजेश पाठक, श्री विजय कृष्ण (बाढ़) मु. सलिम आदि सांसद लोग प्रभुनाथ सिंह के सुर में सुर मिलाके भोजपुरी को  आठवीं अनुसूची में शामिल करने की  जोरदार मांग की । सरकार के तरफ से गृहराज्य मंत्री श्री प्रकाश जयसवाल जी  स्पष्ट शब्द में कहा कि, ‘हमहूँ भोजपुरी भाषी हईं। आपको किसी तरीके से किन्तु या परन्तु कहने की गुंजाइश नहीं है। जैसे आप सब भोजपुरी भाषी क्षेत्र से हैं वैसे आपका यह छोटा सा मंत्री भोजपुरी भाषी क्षेत्र का है। इसलिए इसमें ज्यादा देर नहीं लगेगी। हम उम्मीद करते हैं कि आगामी सत्र में शायद इस संबंध में यह बिल पारित कराया जायेगा जिसके बाद इन दोनों भाषाओं भोजपुरी और राजस्थानी को मान्यता मिलेगी। जिसके लिए लम्बे समय से न केवल भोजपुरी भाषी के लोग, बल्कि हमारे माननीय सदस्य भी चिन्तित रहे हैं।’
गृह राज्यमंत्री जी के स्पष्ट आश्वासन के बाद सांसद प्रभुनाथ सिंह के छाती गजभर के हो गई. बाकिर सरकार का वादा ढाक के दो पात. यूपीए-2 के कार्यकाल में प्रभुनाथ सिंह की जगह श्री उमाशंकर सिंह महाराजगज के सांसद बने उन्होंने 17 मई 2012 को लोक सभा भोजपुरी हेतु जबदस्त आवाज बुलंद किया. दुर्भाग्य से श्री उमाशंकर सिंह का देहांत हो गया और 15 वीं लोक सभा के के अंतिम छ महीनो के पुन: प्रभुनाथ सिंह महाराज गंज से सांसद चुने गए और फिर श्री सिंह ने भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता का प्रशन सरकार के सामने रखा पर 15 लोक सभा का अवसान हो गया लेकिन भोजपुरी की मांग अब भी लंबित है .

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2 thoughts on “भोजपुरी कि संवैधानिक मान्यता के लिए अब तक किये गए सामाजिक प्रयास

  1. प्रकाश चन्द्र पटेल

    ज्ञानवर्धक आलेख.

  2. आलेख सूचनात्मक बा…अउर विस्तार के जरूरत बा….. भाषा में दोष बा……कहि हिंदी त कहीं-कहीं भोजपुरी के परयोग कइल गईल बा।

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