मेहरारू आउर पिंजरा

women in caze

रोज पिंजरा मे दरद सहत

टूटल हियरा जोरत

ओकरे पीर ढोवत

डहकल परान

फतिंगा नीयन बुझानी मेहरारू ।

 

उ मनई रहे

जवन आकास त दिहलस

बाकि पतंग के डोर

अपनही पकड़ के राखस

मेहरारू बुझेनी ओकरा

आपन घर आउर घरौंदा  ।

 

उ मनई रहे

जवन बेदरदी नीयन

रौंद के मुस्किया दिहलस

मेहरारू सोचत रहे

खुलल आकास मे उड़ल ।

 

उ मनई रहे

जवन काट दीहलस

ओकर पांख

बन्द क दिहलस ओकरा

पिंजरा मे ।

 

मेहरारू बन्द पिंजरा मे

सातों जनम इहवें पूरा करेलीं

फेरु सोचेलीं उतारल बोझ

तब सोचेलीं अपना के निखारल

चाहेलीं उड़ल तितली नीयन

चाहेलीं सुख चिरई लेखा

बाकि उहो चाहत मरि जाले

ओही पिंजरा मे ।

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

Related posts

One thought on “मेहरारू आउर पिंजरा

  1. Hareshwar Roy

    अभिव्यक्ति बहुत दमदार बा. रचना के प्रासंगिकता प त कवनो सवाल खड़ा नइखे कइल जा सकत. सब्दन के चयन में काफी सावधानी बरतल गइल बा. मेहरारून के पीड़ा के प्रभावकारी सम्प्रेषण खातिर जयशंकर प्रसाद द्विवेदी जी बधाई के पात्र बानी.
    डॉ. हरेश्वर राय
    सतना, मध्य प्रदेश

Leave a Comment