मैं बदला या मेरा गाँव

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पूरी पीढ़ी से अनजान , ढूंढ रहा अपनी पहचान .

मैं बदला या मेरा गाँव ?

रोजी रोटी शहर भगाई , यदा कदा घर की सुधि आई, .

कितने जनम मरण बीते या, कितनी बार बजी शहनाई

बीत गई कितनी दिवाली , मुझको हुआ नहीं यह भान ..

 

समय यहाँ पर कब ले आया , खिसका कब धरती से पाँव .

मैं बदला या मेरा गाँव ?

तब तो चंचल शाम सुहानी , कहती थी नित नई कहानी,

पगडंडी पर बछडो के खुर , धूल उड़ा करते मनमानी

पगडंडी अब रोड बन गयी , पीडिया पर खुल गयो दुकान ..

 

बुढ़वा बरगद नहीं रहा अब , सिसक रही निमिया कि छाँव .

मैं बदला या मेरा गाँव ?

चकाचौंध में जीवन बीता , लगता है कुछ रीता –रीता,

शहर चला था तब तो खुस था, पता नहीं हारा या जीता.

जाने क्यों मुँह फेरी माटी , बेटा था मै प्रतिभावान ..

 

बड़की अम्मा के मुंडेर पर , नहीं बोलता कागा कांव

मैं बदला या मेरा गाँव ?

 

दरक गई ठाकुर की बखरी , टूट गई पनघट गगरी, .

अगहन-फागुन सुने सुने , भूल गई सावन की कजरी. .

यादों को साकार कर सकूँ , छेडू वही पुरानी तान ..

 

जहां बैठ पलभर  सुस्ताऊं, बचा नहीं अब ऐसा ठांव ..

मैं बदला या मेरा गाँव ?

भाग दौड़ में समझ न पाया , ऐसी आपा-धापी माया,

निभा नहीं पाया मै उनको , जो वादे उनसे कर आया.

तब के बूढ़े स्वर्ग सिधारे , अब तो बच्चे हुए जवान ..

कोई मुझको नहीं बुलाता , लेकर वही मटरुआ नाँव .

मैं बदला या मेरा गाँव?

 

  • मोहन द्विवेदी

 

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2 thoughts on “मैं बदला या मेरा गाँव

  1. vibha rani shrivastava

    आपकी लिखी रचना “पांच लिंकों का आनन्द में” शनिवार 04 मार्च 2017 को लिंक की जाएगी ….
    http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ….धन्यवाद!

  2. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति
    भाग दौड़ में समझ न पाया , ऐसी आपा-धापी माया,

    निभा नहीं पाया मै उनको , जो वादे उनसे कर आया
    वाह !!

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