संवरिया मोरे

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रिम झिम पड़ेले फुहरिया , संवरिया मोरे ।

रहिया निहारत  गुजरिया , संवरिया मोरे ॥

 

बीतल जेठ अब घन घहराइल

चढ़त असाढ़ रोपनी नियराइल

रहि रहि पुकारत बहुरिया , संवरिया मोरे ॥

 

लहरत बिरवा  सोहरे लागल

बरसत धार मे मनवा पागल

उड़ी गइल मोर निनरिया , संवरिया मोरे ॥

 

कुल्हि सिवाने चलत रोपनिया

खेत मे  गावत नइकी धनियाँ

मचलेले मोर कमरिया , संवरिया मोरे ॥

 

संगवे तोहरे  हमहूँ चलती

सभके संगवे धनवाँ रोपती

तोसे मिलाई नजरिया , संवरिया मोरे ॥

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

 

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