साधु बाबा आउर शर्मा जी

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एक बेर एगो शहर मे एगो लमहर सिद्ध साधु अपने 2-3 चेलन के संगे पहुंचलन । उनुकर चेला लोग चारो ओरी घूम घूम के उनुका बारे मे परचार करे लगलन । धीरे धीरे सभके पता चलल कि साधु बाबा ढेर जानकार मनई बाड़ें । उनुका जीभ पर सुरसती माई वास करेलिन । हाथ देख के जेकरा उ जवन बतावत बाटें , कुल्ह ठीक होत बा । ई बात ओहिजा रहे वाला शर्मा जी के मालूम भइल । एक दिन सबेरहीं शर्मा जी नहा धो के साधु बाबा के लग्गे पहुंचलन , आउर 501 रूपिया देके गोड़ लागत साधु बाबा से पुछलन …. बाबा हम कब , कहवाँ आउर कइसे मुअब ?

साधु बाबा उनुकर हाथ देखे लगलन , फेर उनुकर माथा देखलन । फेर एगो कागज पर बहुत देरी ले , जोड़त घटावत शर्मा जी से बोलने – बच्चा जेतना उमिर तोहरे बाबूजी के बा , ओतने उमिर तोहरो बा । जवना स्थिति मे आउर जहवाँ तोहरे बाबूजी मरिहें , ओनही आउर ओही तरे तोहूँ मुअबा । इ सुनते शर्मा जी जूड़ी के मरीज अस काँपे लगलन आउर उहाँ से चल देहलन । एक घरी के भीतरे शर्मा जी अपना बाबूजी के संगे वृद्धाश्रम से अपने घरे लउट अइलन ।

 

  • जयशंकर प्रसाद द्विवेदी

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