शून्य की महिमा

usha

शून्य एक शून्य है , ये बड़ा बहुमूल्य है । आकार  में इसके बहुत कुछ छिपा है । सारी सृष्टि पर इसने चक्रव्यूह रचा  है । इसके व्यूह में हम सब फँसे हैं कैसी विडम्बना है । सब  शून्य में जन्मे , शून्य  में पले और शून्य  में मरे अभी तक न कोई ऐसा  हुआ जो इस शून्य से बचकर जिया सारी सृष्टि इस शून्य में फँसी है ।  बचा जो इससे वो प्राणी नहीं है  वो एक शक्ति है, जो स्वयं शून्य है कुछ इसे ईश्वर , कुछ अल्लाह…

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ज़िन्दगी की राह

gunjika

“राहें  कुछ नई सी” हम तो चले थे साथ साथ , जिंदगी की राह में साथ छोड़ा आपने , दूसरों की चाह  में । हम तो वहीं थे , आपकी उस रह में लोग भी कई थे पर आप ही नही थे । मंज़िल एक थी परंतु  रास्ते कुछ नए थे , सोचा था आप मिलोगे पर आप ही नही   थे । रास्ते आज कुछ नए हैं , मंज़िलें कुछ नई  हैं , लोग तो वही हैं , बस आप ही नही हैं बस आप ही नही है।  …

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पहला कदम (पहिलका डेग)

kalpna-bhat

याद आता है पहला कदम जब पहली बार चलीं थीं तुम । था जन्मदिन उस दिन तुम्हारा सुन रहे थे सब संगीत मधुर । नाच रहीं थीं मगन होकर अचानक से दौड़ पड़ी तुम । चढ़ी सीढ़िया भागे नाना तुम्हारे पीछे पर रुकीं नहीं थीं तुम । एहि था पहला कदम तुम्हारा मेरी लाड़ो मेरी बिटिया हो तुम ।     कल्पना भट्ट भोजपुरी अनूदित  ————- पहिलका डेग ————– इयाद आवता पहिलका डेग जब पहिली बेर चललू तू  । जनमदिन रहल तोहार ओह दिन सभे केहु सुनत रहे मीठ संगीत…

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गधे की जिंदगी

tanya

सुबह सुबह मुर्गे ने बाग़ लगायी कुकडूकू – कुकडूकू तैयार होकर हम तो अपने दफ्तर को चले भाई   पूरे दिन बस काम काम काम ज़िन्दगी में नहीं है एक पल भी आराम   कोई जाता है स्कूल , कोई जाता दफ्तर और कइयों को तो घर में हज़ारों काम सुकून भरी ज़िन्दगी जीना , तो जैसे भूल ही गयी है आवाम   पूरे हफ्ते गधों की तरह काम कर शनिवार, रविवार को मिलता है थोड़ा आराम पर उस दिन भी घर पर आ जाते मेहमान फिर तो बस नाम…

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सहभावना

rantidev

साथ चलना समान पथ पर, भिन्न भिन्न उद्देशोके साथ, भिन्न भिन्न वांछनाके साथ, और फिरभी सब साथमे, सबके साथ होनेमे, सहभागी होनेमे, सुख-दुःखमे, एकदुसरेको सहायभूत होनेमे, पक्ष-विपक्षकी परवा किए बिना, किसी भी अहंभाव रहित, कोई भी पूर्वाभिप्राय बिना …….. यही तो है सहभावना सदगुनी और सत्यनिष्ठ यारकी ! गुजराती भावानुवाद: प्रो.रांतिदेवभाई त्रिवेदी हिंदी भावानुवाद: रक्षित अरविंदराय दावे ता.१८.११.२०१६ भोजपुरी भावानुवाद ————————- एक्के नीयन रसता पर संगही चलल अलगा अलगा काम खाति अलगा अलगा चाह लीहले तबों सभे संगही सभके संगे होखल सहभागी होखल सुख – दुख मे एक दूसरा के…

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सुनो ना..

djp

सुनो ना.. एक बात कहु गर मानो तुम मेरे जाने पर तुम एक किताब लिखना हो सके तो उस पर मेरा नाम लिखना कहि अनकही बाते तुम जरा याद रखना गीले शिकवे जरा कम लिखना हो जाती थी जब नाराज तुमसे मनाने के सबब तुम जरूर लिखना हँसी मजाक किया जब तुमसे बुरा लगा तो जरा माफ़ करना थोड़ी नटखट थोड़ी बिंदास मेरी हर गलती की एक सज़ा लिखना चन्द सखिया चन्द दोस्त उनको तुम ,,,,,,,मेरा सलाम लिखना खता गर मुझसे हुई कोई कभी न तुम उसे रुसवा करना सुनो…

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जीने कि ललक

rakshit

अंतरमन के प्रश्नो के कोलाहल में छा जाती है निस्तब्धता हल नहीं होते जब प्रश्न अनगिनत असंख्य पर वो निःशब्दता छोड़ जाते हैं निशाँ अपने अन्तर्पटल पे सब प्रश्न, दम टूटता नही कभी जिज्ञासाओं का और जीने की ललक और बढ़ती चली जाती है …………. डॉ तारा बेन त्रिपाठी ગુજરાતી ભાવાનુવાદ: ————————— આંતરમનના શોરબકોરમાં વ્યાપી જાય છે, નિસ્તબ્ધતા, જ્યારે અગણિત,અસંખ્ય પ્રશ્નોનો મળતો નથી ઉકેલ, અને એની ઉપર એ નિઃશબ્દતા છોડી જાય છે પોતાની નિશાનીઓ અંતરાવરણ પર બધા જ પ્રશ્નો પર, જિજ્ઞાસાઓનો તો અંત જ નથી આવતો ક્યારેય પણ અને બસ…

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बिटिया अब बड़ी हो गई …….!!

rakshit

दफ्तर से घर आने  की प्रतीक्षा करता उसका वो मासूम चेहरा, झरोखे मे राह देख देखकर, थककर, नींद से घिरी हुई दो प्यासी आँखे, मेरे पैरों  की आहट सुनते ही द्वार खोलने के लिए जल्दी मे दौड़ते हुए उसके दो छोटे पाँव, उसे लाड़से उठाकर घर मे आने के साथ ही एक टॉफी पाने की उम्मीद में फैलती हुई उसकी छोटी कोमल हथेली, ये सब आज मुझे यकायक याद आ गया जब हर रोज की तरह टॉफी देने के लिए  जेब मे डालते हुए मेरे हाथ को रोकते हुए उसने…

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જિંદગી

rakshit

आओ जी ले जिन्दिगी हर अभाव हर तनाव में थोड़ी स्वार्थ पर स्वाभिमान में आओ जी ले जिन्दिगी सुख शान्ति के साथ में भाईचारा और प्यार में मान और सम्मान में आओ जी ले जिन्दिगी कठिन बड़ी है जिन्दिगी अति की चाह में आपसी मन मुटाव में पैसो के जन जाल में आओ जी ले जिन्दिगी बड़ो के सम्मान में संस्कार और ज्ञान में स्नहे और त्याग में बच्चों के प्यार में बड़ो के आशीर्वाद में आओ जी ले जिन्दिगी परिवार के साथ में समाज के उथान में आओ जी…

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माँ की लालटेन

rakshit

जब तुम लालटेन के काजल से काले पड़ गए काँच को राख से घिस घिसकर चमकाती तब मुझे राख और चमक के बीच का सम्बन्ध समझमें आता था … सच बताऊँ ? तू गई और तेरे पीछे लालटेन भी गया, और घर का उजाला भी ……. अभी मैं निकल पड़ा हूँ गुदरी बाज़ार में ……. ढूंढने को तुम्हारा वो लालटेन अगर वो मिल जाए तो कितना अच्छा? क्योंकि ……… उस लालटेन के काँच मे देखना है मुझे माँ …., तेरा चमकदार चहेरा ! मूल गुजराती काव्यरचना : श्री सुरेशचंद्र रावल…

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