मेहरारू आउर पिंजरा

women in caze

रोज पिंजरा मे दरद सहत टूटल हियरा जोरत ओकरे पीर ढोवत डहकल परान फतिंगा नीयन बुझानी मेहरारू ।   उ मनई रहे जवन आकास त दिहलस बाकि पतंग के डोर अपनही पकड़ के राखस मेहरारू बुझेनी ओकरा आपन घर आउर घरौंदा  ।   उ मनई रहे जवन बेदरदी नीयन रौंद के मुस्किया दिहलस मेहरारू सोचत रहे खुलल आकास मे उड़ल ।   उ मनई रहे जवन काट दीहलस ओकर पांख बन्द क दिहलस ओकरा पिंजरा मे ।   मेहरारू बन्द पिंजरा मे सातों जनम इहवें पूरा करेलीं फेरु सोचेलीं उतारल…

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जग- हँसाई

djp

अइसे त उहो भोजपुरिए खाति मरत ह एक बेर कुछो कह के त देखs केहू कुछहू नाही करत ह जइसे एगो फिलिम कइके सुपर स्टार वइसहीं दू पन्ना लिख के बड़का लिखनिहार एगो पतिरका निकार के लमहर संपादक ॥   एगो परम्परा चलत बा चरचा मे आवे खाति भोजपुरी विरोध के हिन्दी हितचिंतक कहाए के पहिलका सीढ़ी आपन हित साधे कs पहिलका जोगाड़ केहू खाति आपन खुन्नस निकारे कs मोका ॥   जात पाँत के भुलाइल बा हम कि तू सभके भीतरी खउलत देखाला विष के गगरी मोका हेरत हेरत…

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पूस के रात

guru

थर-थर कापत हाड़,पूस के रतिया ! जीव-जन्तु बेहाल, छपलस विपत्तिया !!   कोंदो के पुअरा प, लेवा बिछवना बोरसि में करसि, चिपरी जरवना किंकुर-किंकुर क,सभ काटत रतिया !!   लइका-जवान बुढ,घर में पटाइल चिरइ-चुरुंगसभ, खोतवां लुकाइल !! ठाढवा हेरवले ह,सभकर मतिया !!   छुपले सुरुज जाइ,कवना नगरिया ! परत कुहेसा घोर,दिनवों अन्हरिया !! अइसन भइल ”गुरू” पूस के रतिया !!   गुरुबिंद्रा सिंह “गुरु”

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चना जोर गरम

guru

चना जोर गरम, बाबू , तू लेल चना जोर गरम ! हमार चना बनल अलबेला, खइलन भिरगू बाबा क चेला ! जिनका नाँव प ददरी मेला , गंगा घाट प रेलम- पेला !! देख सजल दुकनियाँ ठेला, जहवाँ बिकत जलेबी केला ! भइल लइकन के झमेला , जेब मे नइखे एगो धेला !! चना जोर गरम हमार चना बनल बा ऊल, देख इ हावड़ा के पुल ! बगल मे खुलल बा इस्कुल, लइका खेल में गइले भुल !! देहिया पोतले माटी धूल, मास्टर मार दिहले दू रुल ! पिठिया हो…

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भइल नोटबंदी

u-p-dwivedi

भइल नोटबंदी भइल नोटबंदी इ गरवा के हड्डी भइल नोटबंदी   खबर जइसे आइल मचल बाटे हल्ला आ बैंके के नीचे जुटल बा मोहल्ला मरद मेहरारू आ हम आउर रुऊआ लगल सब निकाले आपन पान सऊवा त बिहने से लल्लन लगा लिहलें लाइन आ गड्डी क रुपिया ले अइलीं पड़ाइन आ सोचलस सभै कि लगा लीहिं छक्का त होखे लगल रोज धक्का पे धक्का लाइन में लग के लगल लोग बोले कि चोरवन क मोदिया बिगड़ले बा ठंडी ॥ भइल नोटबंदी…………………..   दुखा गइलें भइया,दुखा गइलीं भउजी दुखा गइलें उहो…

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कहानी बनेब हम सऊँसे सदी के

k-m-pandey

रउरा देखीं हमरा नेकी बदी के। कहानी बनेब हम सऊँसे सदी के। बान्ह तूरे सगरो पनिया के धारा कहाँ केहू रोकेला कवनो नदी के। हियरा उजर रउरा चूना से राखीं रँगवा बदल जाई पीयर हरदी के। हम मेहनत से मुँहवाँ मोड़िले नाहीं बनत रही शान रउरा राजगदी के। जिनगी के जोगे जतन कइले रुपया समय के फेरा भइल गठरी रदी के। पिरितिया क पेड़वा सूखी ना कबहूँ बाचल रही जहियाले सबर हदी के। ——- केशव मोहन पाण्डेय ——- 28/12/2016

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संघतिया

dilipp

कटले कटात नइखे विरह में  रतिया, दूर काहे चल गइल$ आय हो,संघतिया । हिक भर तोहे देख नाहीं पवनी दरदिया दिल के सुना नाहीं पवनी अकेला छोड़  गइल$ हमे अधरतिया दूर काहे चल गइल$ आय हो,संघतिया। चांद के रोशनिया दरद बढावे तहरो इयाद करेजा डहकावे मनवा में उठे हूक बोले जब कोइलिया दूर काहे चल गइल$ आय हो,संघतिया। शीतल$ बेयरिया अंचरा उडावे विरहा के अगिया देहिया जरावे धक-धक कर$ताटे हमरो छतिया, दूर काहे चल गइल$ आय हो,संघतिया। नित-दिन गिरत बाटे अंखिया से लोर चली गइले पिया मोहे तडपत छोड केह…

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ई त समय के हs संयोग

k-m-pandey

कइले बाटे घात कुठहरा समय-समय पर लोग। ई त समय के हs संयोग।।   लोगवा के मतिया के गतिया कबो समझ ना आवे अपने जनमल अपने माई के बेर-बेर लात देखावे कइसे पीर पराई भाई भाषा के धइलस कइसन रोग। ई त समय के हs संयोग।।   आपन-आपन राग अलापे एक्के महतारी के पूत एक्के मंजिल पर डगर अलग बा बने सभे अवदूत केहू करे सन्मान भाव से करेला केहू उपभोग। ई त समय के हs संयोग।।   अपना-अपना दमभर लोगवा निशदिन जोर लगावे भोजपुरी भाषा अबहिन ले तबहूँ त…

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कुछ मुक्तक

abhishek1

गुलाब के खुशबू के तरे रसल बा केहु नेह नहाइल नयनन मे बसल बा केहु दिल के धड़कन धड़क ई कहत बा हमके याद कर के दूर हंसल बा केहु।   हमार दिल के दरवाजा खटखटावल केहु, हमार फोटो आज सिना से सटावल केहु, हमार प्यार ह पूजा पावन गंगा पानी जस बिना मिलले हमे प्रेम रस में पटावल केहु।   अब आँखिन उनकर राह निहारत बानी, दिल के दुआर उनका बदे बहारत बानी, बार बार सिना से सरकत बा ओढ़नी केहु उनका सिवा देखे ना सम्हारत बानी।   अभिषेक…

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चलत गइनी

rajiv-upadhyay

रस्ता चले के रहल चलत गइनी अउरी मिलल जे मिलत गइनी। हिय मिलल मिलल जियरा कि जियत गइनी कि मुअत गइनी। मिलल जे मिलबे कइल कि साथ सभकर छोडत गइनी। जे मिली संगे ऊ चलबे करी सोचि के हम उडत गइनी। बाकिर काहाँ होला अइसन कि अइसहीं हम सियत गइनी। जे साथ बा कबो जइबे करी इहे जिनगी भर कहत गइनी। कि साथे काहाँ सभ केहू चले सोचि हर मोड छोडत गइनी।     राजीव उपाध्याय 

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