वेलेंटाइन पर मंगरु का लिखा खत”…

khat

मेरी करेजा”… वेलेंटाइन बाबा के कसम ई लभ लेटर मैं डेहरी पर चढ़कर लिख रहा हूँ… डीह बाबा काली माई के कसम आज तीन दिन से मोबाइल में टावरे नहीं पकड़ रहा था… ए करेजा”.. रिसियाना मत… मोहब्बत के दुश्मन खाली हमरे तुम्हरे बाउजी ही नहीं हैं”…. यूनिनार औ एयरसेल वालें भी हैं”… जब फोनवा नहीं मिलता है तो मनवा करता है कि गढ़ही में कूद कर जान दे दें…. अरे इन सबको आशिक़ों के दुःख का क्या पता रे”….? हम चार किलो चावल बेच के नाइट फ्री वाला पैक…

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“कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा , भानुमती का कुनबा जोड़ा “

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का ज़माना आ गयो भाया, तुम्मा फेरी फिर शुरू हो गयी । अंदर – बाहर , आने – जाने का चिर – परिचित खेल अपने शबाब पर है । जिसे देखो वही धकियाने मे जुट गया है । हर जगह फोटो खिंचवाने की होड़ मची हुई है । कइयों के तो जिह्वा से नम्रता टपकने लगी है , जो गुर्राते थे , मिमियाने लगे हैं । आखिरकार असली मालिक से सामना जो होना है । मालिक तो मालिक ही होता है , उसके सामने तो अच्छे अच्छों की घिघ्घी बंध…

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यज्ञ – आहुति की चिर परंपरा का उद्घोष

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का जमाना आ गयो भाया , लोकतंत्रीय युद्धघोष आखिर हो ही गया । चीं चीं चूँ चूँ से तंग आकर बिचारे रेफरी को उद्घोष करना ही पड़ गया । और कर भी क्या सकता था बेचारा , परिपाटी और परंपरा का पालन तो लोकतन्त्र मे करना ही पड़ता है ।अब अलग अलग अखाड़ों मे पहलवानों का जमघट बढ़ चुका है , हर एक को पास चाहिए । बाहें चढ़ाने से लेकर फेटा कसते हुये अपने अपने अंदाज मे ताल जो ठोकनी है । साथ ही साथ सभी को उत्तर प्रदेश…

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समाजवाद की नूरा कुश्ती

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का ज़माना आ गयो भाया, समाजवादियों की नूरा कुश्ती ने तो कार्टून चैनलों के टी आर पी की वाट लगा दी . वैसे भी वर्ष के प्रथम माह में कार्टून चैनल देखने वालो विदेश यात्रा पर चले जाते हैं , वो भी बिना किसी पूर्व सूचना के . बेचारे चैनल वाले , उनकी स्थिति तो सांप छछुंदर वाली हो जाती है . बचे – खुचे उस राशि वाले नूरा कुश्ती देखने में मस्त हैं , बेचारी पब्लिक ए टी एम् की लाइन से त्रस्त है . समाजवादियों ने तो एकता…

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एक पत्र संत वेलेंटाइन के नाम

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संत वेलेंटाइन सुनो ! आजकल बड़ा जलवा है गुरु तुम्हारा । फेसबुक,ट्वीटर, व्हाट्स एप,अख़बार के पन्ने, किसी कालखण्ड का बुद्धू बक्सा आज जो बेहद चतुर और अनिवार्य हो गया है उसमें , हर कहीं,हर ओर तुम्हारी चर्चा है।इतनी चर्चा है कि वसंत का मुख भी पीला पड़ गया है।वैसे पीला सिर्फ तुम्हारी वजह से नहीं खुद उसके चाहने वालों की तरफ़ से भी है।कोयल नहीं कूकती, मंजरियाँ दूर -दूर तक नहीं दीखतीं, मदनोत्सव नहीं होता तो कैसे लोग जान लें कि वसन्त आ गया।नयी -पुरानी पीढ़ी ने मान लिया है कि…

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एक ठे बनारस इहो ह गुरु …

suman-singh

‘का गुरु आज ई कुल चमचम ,दमदम काँहे खातिर हो ,केहू आवत ह का ‘? प्रश्न पूछने वाला दतुअन करता लगभग चार फुट ऊँची चारदीवारी पर बैठा आने -जाने वालों से पूछ रहा था। ”काहें मोदी आवत हउअन ,तोहके पता ना ह ?” पता ना ह ‘ ऐसे गुर्राते हुए बोला गया कि यदि पूछने वाला पहुँच में होता तो दो तीन लप्पड़ कही गए नहीं थे। पर पूछने वाला भी अजब ढीठ ,तुनक कर बोला -“जा जा ढेर गरमा मत….. .” कहता हुआ वह ‘ कोई नृप होहुँ हमहि…

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उचरत हरिनंदी के पीर (कलयुगी महाभारत का आगाज )

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का जमाना आ गयो भाया ,घरही मे जुत्तम पैजार । सच मे हो  रहा है , या कोई सीरियल चल रहा है , अरे वही सास बहू स्टाइल वाला । शायद फिल्मी ड्रामा का कोई  रिहलसल चल रहा है । कहीं हीरो और जीरो बनाने वाला कोई पहले से सोची समझी रणनीति तो नहीं । आज का समय सहसा किसी राजनीतिज्ञ और उसके परिवार पर विश्वास करने की अनुमति नहीं देता । क्योंकि आज के राजनीतिज्ञ जनता के सेवक नहीं बल्कि स्वामी हैं । 6 महीने एक साल के अंदर…

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उचरत हरिनंदी के पीर ( भई गति सांप छुछुंदर केरी )

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का जमाना आ गयो भाया , घर में घुसकर पुंगी बजा गए | बड़ी आफत है भाई ,पहले लोग कड़ी निंदा से काम चला लेते थे , लेकिन अचानक अपना स्वभाव क्यों बदल लिया ? शाकाहारी होकर भी इतना तेज झपट्टा , सहसा विश्वास ही नहीं होता | अजीब हालत कर दी यार , न कहते बन रहा है और न ही सुनते | इस बार तो थू – थू करा दी पूरी दुनिया में | अब तो रोने भी नहीं दे रहे , जिसके आगे रोने जा  रहे थे…

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उफ्फर पड़ो ओही देस में जहाँ लैला न मिल्लें

suman singh

‘ कह देत हईं साह जी ,ऊ तोहार नखड़ुआ एक दिन मजे में कुटाई।जानत हउआ आज कहाँ रहल ह ?’ नन्हकू साह जी के दूकान में घुसते नखड़ू क भविष्य बांचे लगलन। ‘ काहें आग लगावेला यार नन्हकू।अबहीं साह जी के कपारे का कम बीपत बा कि अब तू हूँ आ गईला आकी-बाकी पूरा करे।’ एक जाना साह जी ओरी से नन्हकू के घुडुकलन बाकिर नन्हकू चुप होवे क नाम ना लेत रहलन। ‘ ई कवनो उमर ह ई कुल में पड़े क।बतावा भइया अबहीं दाढ़ी -मूँछ ना आयल अउर…

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उचरत हरिनंदी के पीर – (कवने गुमाने आन्हर घुमची)

ghumachi

रसरी जलल जाता बाकि ओकर अइठन नाही छुटत भा कुकुर के पोंछ नव महिना बादो टेढ़ के टेढ़ रहि जाले ,इ एगो लमहर रहस्य बा . जवन पीढ़ी दर पीढ़ी चलल आवत बा . कमाल के बात  इ बा कि अजुवो सांच बा . ना घटंती , ना बढंती . आजु काल्ह के समाज के इ दुनो वाक्य चरित्र चित्रण क रहल बाटें, सगरो कुछ ओनइस बीस अइसने देखइतो बा . का करबा महाराज ,केकर केकर चरित्तर उचरबा , इ कहत कहत भगेलू चच्चा बड़कू के हुरपेटलें . बड़कू के…

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