हिंदी फिल्मों में माँ पर कुछ यादगार गीतों के बोल…….

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माँ जीवन का सार है माँ हैतो संसार। माँ बिना‘लाल’जीवन समझों हैं बेकार।। हिंदी फिल्मों में मां की थीमपर फिल्माए गए सभी गीत फिल्ममें माँ का एक दमदार किरदार के आसपास रहे हैं। माँ एकशब्द है जिसमें श्रृष्टि के समस्त जीवो की उत्पति होती है .इसलिए माँ की महिमाअद्वितीय है। अपवादों को छोड़ दिया जाए,तो शुरू से ही कई सामाजिकहिंदी फिल्मों में मां की एक संस्कारी,पारंपरिक,और: मातृत्व कीशक्ति और विश्वास से मजबूतछवि देखने को मिलतीहै। हिंदी फिल्मी गीत में माँ कीछवि की शुरुआत चौथे दशक की है- हिंदी फिल्मों में…

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नारी के मान सम्मान का सही से रखे ख्याल- लाल बिहारी लाल

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हमारी भारतीय संस्कृति ने सदैव ही नारी जाति का स्थान पूज्यनीय एवं वन्दनीय रहाहै, नारी का रूप चाहे मांके रूप में हो, बहन के रुप में हो,बेटी के रुप में हो या फिर पत्नी के रूप में हो सभी रुपों में नारी का सम्मान किया जाता है। यह बात आदिकाल से ही हमारे पौराणिक गाथाओ मेंविद्यमान रही है।और आज भी जगह –जगह देवी के रुप में पूजी जाती हैं। नौ रात्रों मेंक्न्या खिलाने की प्रथा आज भी विद्यमान है।हमें यह भी ज्ञात है कि नारी प्रेम, स्नेह,करूणा एवं मातृत्व की…

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लोकभाषा के काव्य आ ओकरा चर्चा पर चर्चा

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– डॉ अशोक द्विवेदी लोकभाषा में रचल साहित्य का भाव भूमि से जुड़े आ ओकरा संवेदन-स्थिति में पहुँचे खातिर,लोके का मनोभूमि पर उतरे के परेला। लोक कविताई के सौन्दर्यशास्त्र समझे खातिर लोकजीवन के संस्कृति, लोकदृष्टि ओकरा अनुभव-सिद्ध मान्यता आ संवेदन-ज्ञान के समझल जरूरी बा। अक्सरहा एघरी,कुछ लोग भोजपुरी साहित्य आ ओकरा कविताई के अपना विचार दर्शन, अपना रुचि -पूर्वग्रह आ जानल सुनल राजनीतिक-समाजिक अवधारणा आदि का सुबिधानुसार देखे,जाने आ आँके के कोसिस का साथ मूल्यांकनो करत लउकत बा। अपना निजी सोच, बिचार-दर्शन में ऊ लोग भोजपुरिये ना, कवनो भाषा-साहित्य के…

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स्वतन्त्रता

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स्वतंत्रता ! पढ़कर सबसे पहले अपने देश की स्वतंत्रता ज़हन में आई । जो भी कुछ व्यक्त कर रहीं हूँ , ये मेरा निजी मत है कृपया अन्यथा न लीजियेगा । स्वतंत्रता को मैं अलग अलग दृष्टिकोण से देखती हूँ – 1 व्यक्तिगत 2 पारिवारिक 3 सामाजिक 4 देश 5 सर्व व्यापी हम मानव सामाजिक प्राणी है । एक एक व्यक्ति समाज का अभिन्न अंग है । मुझे लगता है स्वतंत्रता की परिभाषा हर व्यक्ति के लिये अलग होगी । जो एक व्यक्ति के लिये सही होगा हो सकता है…

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रास्ता- आपकी अपनी जीत का

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एक सामान्य व्यक्ति  सोचता है कि  हमारे भाग्य में जो लिखा है , वही हमें मिलता है। हमारे साथ अच्छा -बुरा जो हो रहा है , वो सब ईश्वर की इच्छा से हो रहा है । पर यह सच नहीं है , आप इस सच से अनजान हैं कि आपके  भाग्य का निर्माता कोई और नहीं अपितु आप  स्वयं हैं , अपनी ज़िन्दगी के  रचनाकार आप स्वयं हैं , आपकी ज़िन्दगी की कहानी कोई दूसरा नहीं लिख सकता । ऐसी कोई शक्ति नहीं जो आपके जीवन का उद्देश्य निर्धारित करे…

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एड्स का जागरुकता ही बचाव है

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लगभग 200-300 साल पहले इस दुनिया में मानवों में एड्स का नामोनिशान तक नही था। यह सिर्फ अफ्रीकी महादेश में पाए जाने वाले एक विशेष प्रजाति के बंदर में पाया जाता था । इसे कुदरत के अनमोल करिश्मा ही कहे कि उनके जीवन पर इसका कोई प्रभाव नही पडता था। वे सामान्य जीवन जी रहे थे। ऐसी मान्यता है कि सबसे पहले एक अफ्रीकी युवती इस बंदर से अप्राकृतिक यौन संबंध स्थापित की और वह एड्स का शिकार हो गई क्योकि अफ्रीका में सेक्स कुछ खुला है , फिर उसने…

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“नये रोजगार की तलाश में भोजपुरी विरोध का कुटीर उद्योग”

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इस बीच हिन्दी  के कुछ अवकाश प्राप्त आचार्यों ने नये रोजगार की तलाश में भोजपुरी विरोध का कुटीर उद्योग शुरू किया है। इसकी खासियत यह है कि भोजपुरी को मान्यता दिलाने के लिए जो लोग आवाज उठा रहे हैं उन्हें निहित स्वार्थ के लिए हिन्दी को बाटने वाला करार दिया जा रहा है।इनमें ऐसे लोग भी शामिल हैं जो पश्चिम बंगाल में सीपीएम के दौर में नौकरी और प्रोमोशन के लिए रातोरात जलेस हो गये थे।आश्चर्य तब हुआ जब पुलिस में डीजीपी रह चुके अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति…

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सामाजिक समरसता के व्रत हऽ छठ

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दियरी-बाती बीत गइल। भाई-टीका के सथवे लगनदेव जागे लगले। अब सबसे पावन परब छठ के तैयारी बा। जहाँ देखीं, ऊहवे छठ के निर्मलता लउकत बा। बाँव-देहात से ले के राजनीति होखे चाहे टी वी- फिलिम, चारू ओर छठ से छटा लउकत बा। एकरा सथवे अपना सभ्यता-संस्कारन के छटा लउकत बा, अपना देश-दुनिया के छटा लउकत बा। अपना भेजपुरी संस्कृति में देवी-देवता से लेऽ केऽ प्रकृति लेऽ पूजा-उपासना के परब-त्योहार मनावल जाला। ओही पर्वन में सूर्योपासना खातिर छठ के एगो अलगे महत्त्व हऽ। छठ व्रत सूर्य षठी के होला जवना कारने…

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सभ कमिटी आ मापदंड भोजपुरी के सांविधानिक मान्यता ला?

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देश के संविधान लागू भइल त 14 को भाषा अष्टम अनुसूची में आइल। तब कवनो मापदंड ना तय भइल रहे। 1967 में सिंधी भाषा अष्टम अनुसूची में आइल। तबहुँ ना कवनो कमिटी ना कवनो मापदंड। 1992 में कोंकणी, मणिपुरी आ नेपाली के शामिल कइल गइल। ना कवनो कमिटी ना ना कवनो मापदंड।2004 में बोड़ो, डोगरी,मैथिली आ संथाली के सांविधानिक मान्यता मिलल। ओहि बेरा ना कवनो कमिटी बनल ना कवनो मापदंड तय भइल। हाँ 1996 में अशोक पावहा कमिटी बनल। जेकरा संविधान के अष्टम अनुसूची में शामिल करे खातिर भाषा के…

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भोजपुरी के वर्तमान स्वरूप : गत्यात्मक आ विकासमान

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अपना प्रिय अंदाज,मिसिरी के मिठास आ पुरुषार्थ के दमगर आवाज का कारन भोजपुरी शुरुए से आकर्षण के केंद्र में रहल बिया | भाषा निर्भर करेले विशेष रूप से भौगोलिक कारन आ बोलेवाला लोगन के आदत,रुचि आ प्रकृति पर | विशेष परिस्थिति भी एह में आपन बरियार प्रभाव छोड़ेले | भोजपुरिया लोगन के अलग–अलग क्षेत्रन में प्रभावित करेवाला अलग–अलग कारकन का चलते भोजपुरी के भी कई गो रूप लउकऽता आ अभी तक कवनो महाबीर एकरा के अनुशासित कऽके मानक रूप ना दे पवले | वर्तमान में ई काम आसान नइखे रहि…

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