बिला रहल थाती के संवारत एगो यथार्थ परक कविता संग्रह “खरकत जमीन बजरत आसमान “

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मनईन के समाज आउर समय के चाल के संगे- संगे  कवि मन के भाव , पीड़ा , अवसाद आउर क्रोध के जब शब्दन मे बान्हेला , त उहे कविता बन जाला । आजु के समय मे जहवाँ दूनों बेरा के खइका जोगाड़ल पहाड़ भइल बा , उहवें साहित्य के रचल , उहो भोजपुरी साहित्य के ,बुझीं  लोहा के रहिला के दांते से तूरे के लमहर कोशिस बा । जवने भोजपुरी भाषा के तथाकथित बुद्धिजीवी लोग सुनल भा बोलल ना चाहेला , उहवें  भोजपुरी  के कवि / लेखक के देखल ,…

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जिनगी के हर कोना के उकेरत कविता संग्रह “जिनगी रोटी ना हs”

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आजु के जुग मे जहवाँ रिस्तन के जमीन खिसक रहल बा , अपनत्व के थाती बिला रहल बा ,उहवें एकरा के जीयब उहो जीवंतता के संगे , एगो मिशाल हs । जवने समय में मनई अपने माई भाषा के बोले मे शरम महसूस करत होखो , ओहि समय मे आपन  माई भाषा बोलल आउर ओहु से बढ़ी के ओह मे साहित्य रचल , एगो लमहर काम बाटे । उहवें कवि हृदय केशव मोहन पांडेय जी अपना के अपने माई भाषा खाति समर्पित कइले बानी । जवने के परिणिती बा इ…

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ताजा पढ़ी किताब : भोर भिनुसार

santosh patel

संस्कृत शब्दावली देवी-देवताओं के पर्यायवाचियों से लड़ी पड़ी हैं। अरबी में ऐसा नहीं है। अरबी में, विशेषकर इकी प्राचीन बोलियों में ऊँट तथा उससे सम्बंधित अन्य  शब्दों की संख्या 5744 हैं किन्तु संस्कृत में सिफ शिव और रूद्र के संयुक्त रूप से 3411  नाम हैं, उनके बाद विष्णु 1676  और इंद्र के 451  नाम है। स्पष्ट है कि  संसार की सभी भाषाओँ की अपनी संस्कृति है और उसी संस्कृति के आधार पर विभिन्न  भाषाओँ में पर्यायवाचियों की संख्या होती हैं। भोजपुरी में सुबह और उसके आगे पीछे के समय के लिए अनेक शब्द पाए जाते…

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“बनचरी”: भावपूर्ण प्रेम कथा के बहाने मानव मूल्यों की कृति

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अपनी भाषा , अपनी बोली भोजपुरी के साथ साथ, अपनी माटी के सोंधेपन से भरी कवि डा. अशोक द्विवेदी की लेखनी से सृजित “बनचरी” वह कथा विन्यास है , जो पाठक को अपने कथारस और रंग  में रंगकर पात्रों के संग ला खड़ा करता है | उपन्यासकार द्वारा कृति के नामकरण से ही कथाकार – दृष्टि  परिलक्षित हो जाती है | जो लेखक के भाषा शिल्प, ज्ञान  और लेखन के सौन्दर्य बोध से पाठक का सहज मिलन करा जाती है | भाषा की सहजता , लालित्य , जगह जगह उकेरे…

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गुरु शिष्य सम्बन्ध के नवे रूप में उकेरत खंडकाब्य : एकलव्य

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भोजपुरी आउर हिंदी के सराहनीय कवि डा. गोरख प्रसाद “मस्ताना” आपन कवित्त , मंच गेयता अउरी गीतन के कारन हमेशा चरचा में रहेलन . मस्ताना जी के गीतन के ताजगी अपने आप में बेजोड़ आउर मनमोहक बाटे . ओ गीतन में अगर केहू एक बेरी डूबकी लगा लेहलस उ कबों बहरे आवे के नावें ना लेत . जहवाँ गीत आउर गजल मस्ताना जी से शुशोभित होत अभिभूत रहेलन ,उहवें मानवीय मूल्यन के जीये वाला कवि आपन कविता में  माटी के सोंधी महक से  हमेशा पढ़निहारन अउरी सुननिहारन के सराबोर करत…

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