परम_पूज्य_वो_नारी_है….

ratnesh-chnachal

सारी शक्ति जिसमें समाहित परम पूज्य वो नारी है सब कुछ उसके आंचल में है वो ऐसी अधिकारी है ।   बने कभी सावित्रि सीता कभी बने वो लक्ष्मीबाई, लिए खजाना ममता का प्रेम सुधा है वो बरसाई, हर युग में अपमानित होती ये कैसी लाचारी है ।   हुई प्रेमिका राधा तो एक अमिट इतिहास लिखा पत्थर की जब बनी अहिल्या नारी का संत्रास लिखा, मर्यादा कि रक्षा खातिर अपनों से वो हारी है ।   त्यागी है बलिदानी है सबसे बड़ी वो दानी है, लिया समय जब भी…

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मैंने पुरुषोत्तम राम दिया

yogi

8 मार्च विश्व महिला दिवस पर एक रचना…………! श्रृंगारों का झाँसा देकर, पैरों में पायल बाँध दिया जिसको मैंने जना उसी ने मुझको अबला नाम दिया। अपनों खातिर सती हुई मैं जौहर सा बलिदान दिया बन पाषाण कभी मैनें ही अपना जीवन दान दिया। अग्नि परीक्षा से मैं गुजरी पर अपनों का साथ दिया बिगड़ी हुई लकीरों आगे मैंने अपना माथ दिया। रखकर मुझको चौसर पर इतिहास नें कैसा मान दिया वस्तु बनाकर मुझको ही मेरा सबनें दान दिया। खूब जिया मैंने हर युग को जैसा जो अंजाम दिया फिर…

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सब मन भावन है बसंत में

sk chaturvedi

सब कुछ पावन है, बसंत में, सब मन-भावन है बसंत में। खिले फूल, पेंड़ो पर, मंज़र, चले मस्त, बौराए, मधुकर, सरसों की,क्यारी, इठलाती, फैले खुशबू, दिग-दिगंत में, सब मन-भावन है बसंत में। पुरवा, आग लगाये, तन में, मोर-पपीहा हरसे वन में, वाणी में, मिसरी सी, घोले, कोयल कूके ,मधुर कंठ में, सब मन-भावन है बसंत में। सखी,सलेहर, प्रीतम ,प्रियवर, हर्षित-खुश,प्रफुल्लित,मिलकर, रंग,अबीर ,गुलाल, उड़ाकर, बिखरा देते राह -पंथ में, सब मन-भावन है बसंत में।ल दूर से आता भक्तों का दल, करने शिव-अर्पित,गंगा-जल, भांग-धतुरा, विल्व -पत्र दे, सहज-जोड़-लेता,अनंत, में, सब मन-भावन है…

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वैलेंटाइन डे

vinod Pandey

जब वैलेंटाइन आता है, दिल बाग-बाग हो जाता है, सूने वीराने पतझड़ में, जैसे बसंत छा जाता है, रिमझिम सी घटा बरसती है, इस माघ-पूस के सावन में, मन किशन-कन्हैया हो जाए, दीवानों के वृंदावन में. करते हैं याद सभी वो दिन जब साथ घूमने जाते थे, हिलते-डुलते उन झूलों में, वो भी पूरे हिल जाते थे, पर पास में कोई रहता था तब, झूठी हिम्मत शो करते, अंदर से दिल घबराता था, बाहर से हो-हो करते. कुछ ऐसे वीर अभी भी है, जो याद संजोए रहते है, गत साल मिला जो…

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जौहर की पूजा की होती।।”

yogi

हिन्दुस्तान के इतिहास के साथ छेड़- छाड़ करती हिन्दी फिल्में और समाज के मौन पर एक रचना ……!👏👏 टूट कर हिम्मत भाड़ों की शायद बिखर गई होती गर बैडिड क्वीन थिएटर में नंगी नहीं दिखी होती। गर फूलन पर हम सब की जुबाँ बंद नहीं होती आज कथा हिन्दी फिल्मों की शायद बदल गई होती। अगर हमारी आँखों से लज्जा नहीं गई होती तब शायद भंसाली ने पद्मावत पढ़ ली होती। गर फिल्म बनाने वालों ने प्रेम कथा समझी होती पर्दे पर इतिहास विजेता बाजीराव दिखी होती। मनोरंजन के नामों…

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भरोसा तुनें तोड़ा………!

yogi

हम सब का एतबार भरोसा तुनें तोड़ा बना दें कैसे फिर सरकार भरोसा तुनें तोड़ा।   जातिवाद के समीकरण का बन कर पालनहार भरोसा तुनें तोड़ा लोकतंत्र यह किसका था, अब किसका है अधिकार भरोसा तुनें तोड़ा। बना दें कैसे फिर सरकार भरोसा तुनें तोड़ा। तुष्टिकरण के आगे कर के सेकुलरता लाचार भरोसा तुनें तोड़ा जन जन की नईया भेंट चढ़ा कर दंगो के पतवार भरोसा तुनें तोड़ा।   बना दें कैसे फिर सरकार भरोसा तुनें तोड़ा। बली चढ़ा कर भत्ते पर, कितनों का रोजगार भरोसा तुनें तोड़ा खूब बढ़ाया…

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बचपन

tanya

एक रोज़ मैं अपने कमरे मैं बैठा यूं ही कुछ गुनगुना रहा था कुछ पुरानी तस्वीरें देखकर मन ही मन मुस्कुरा रहा था बचपन की वे तस्वीरें देखकर मेरे  मन से आई एक आवाज़ वे भी क्या दिन थे न कोई  था न कोई तकलीफ भी जो मन कहता था वही हम करते थे कभी किसी से डरा नहीं करते थे जब चाहा  हँस  दिए जहाँ चाहा रो दिए अब हँसने के लिए भी तहजीब चाहिए और रोने के लिए तन्हाई पहले न किसी बात से घबराते थे न ही…

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तुम्हें क्यूँ शर्म……..!

yogi

ख़ुदा नें जब हमें तुमको तराशा एक गहनें में तुम्हें क्यूँ शर्म ना आई हमें काफ़ीर कहनें में। झुकाते शीश हम अपना ख़ुदा के हर ठिकानें में कभी काशी औ काबा में कभी मथुरा मदीने में। हम ढूढते माधव को तेरे भी अंजानो में तुम्हें तकलीफ़ है कैसी हमारे राम गानों में। कहाँ जन्नत तुम्हारी है धरा से दूर जानें में लगे हो आशियाँ अपना जहन्नुम क्यूँ बनाने में। गुलिस्ता था बड़ा शौक़ीन बदला क्यूँ विरानें में कहाँ से आ गई नफ़रत मनुज के इस घरानें में। सुलगते क्यूँ हो…

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शून्य की महिमा

usha

शून्य एक शून्य है , ये बड़ा बहुमूल्य है । आकार  में इसके बहुत कुछ छिपा है । सारी सृष्टि पर इसने चक्रव्यूह रचा  है । इसके व्यूह में हम सब फँसे हैं कैसी विडम्बना है । सब  शून्य में जन्मे , शून्य  में पले और शून्य  में मरे अभी तक न कोई ऐसा  हुआ जो इस शून्य से बचकर जिया सारी सृष्टि इस शून्य में फँसी है ।  बचा जो इससे वो प्राणी नहीं है  वो एक शक्ति है, जो स्वयं शून्य है कुछ इसे ईश्वर , कुछ अल्लाह…

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ज़िन्दगी की राह

gunjika

“राहें  कुछ नई सी” हम तो चले थे साथ साथ , जिंदगी की राह में साथ छोड़ा आपने , दूसरों की चाह  में । हम तो वहीं थे , आपकी उस रह में लोग भी कई थे पर आप ही नही थे । मंज़िल एक थी परंतु  रास्ते कुछ नए थे , सोचा था आप मिलोगे पर आप ही नही   थे । रास्ते आज कुछ नए हैं , मंज़िलें कुछ नई  हैं , लोग तो वही हैं , बस आप ही नही हैं बस आप ही नही है।  …

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