सोच भाई सोच

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अच्छे दिन आने वाले थे , इतने अच्छे आएंगे सोच रहे लेटे लेटे , काले धन वाले मर जाएँगे ॥ दूध दही और घी मख्खन का भी लुत्फ उठाएंगे अपने बच्चे हलवा पूड़ी, उनके बच्चे क्या खाएँगे कौन है ये जिसने हमको ऐसे सपने दिखलाए हैं हम घूमे मोटर गाड़ी पर , वे पैदल पैदल आएंगे ॥ हम पर तंज़ नहीं होगा तो हमको रंज नहीं होगा मेरी घर घर खातिरदारी , वो बाहर गाली खाएँगे काम काज मे हम माहिर इतनी जल्दी हो जाएँगे बड़े बड़े होटल होंगे ,तो…

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मानस में पुष्प खिल रहे

ramraksha

मानस में पुष्प खिल रहे आँखों में दर्द बस रहा। आदमी  यहाँ  रो रहा कभी तो कभी हँस रहा।   सुंदरता चांद की उभार रही पीर मौसम ने छीन लिए आँखों से नीर तैरकर निकल गए विचार भाव डूब–डूब फँस रहा।   दर्द गीत सुन लोग मुस्करा रहे दाद दे समझ भाव की जता रहे कहीं चैन बाँसुरी बजी कहीं चैन नाग डँस रहा।   – रामरक्षा मिश्र विमल  

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गीत

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पिएँगे जरूर  रुको जरा  फूँक लेते हैं मठ्ठे का  भी  क्या  भरोसा  भला है   गौओं की खाल ओढ़  शेर भी खड़ा है मुख मधुमय किंतु हृदय विष से भरा है चर्बी ही है  घी नहीं  पर  क्यों रंजिश युग है नादान  मिलावट पर मचला है।   दुर्घटनाएँ  आज   ऐसी  हो    जातीं हंसवाहिनी   रक्त   सारा  पी  जातीं बदनाम वे   ही  जो  सस्ती  पीते  हैं मौसम के  हाथ  सत्य का  फैसला है ।   फूँक–फूँककर ही  कदम रखना  यारो खाने से पहले  बिल्कुल  चखना यारो मुमकिन है मुसका दे फिर कोई…

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